देहरादून। श्रावक को अपने जीवन में दया,करुणा, विवेक को अपने जीवन में आत्मसात करना चाहिए। हमें सदा जीवों पर दया करनी चाहिए। हमारे भीतर करुणा का भी समावेश होना चाहिए। ताकि हम सामने वाले का दुःख दर्द समझ सकें। भगवान श्री महावीर स्वामी ने भी जीयो और जीने दो की बात कही है। धर्म ज्ञान के लिए हमें अपने विवेक का उपयोग करना चाहिए। आचार्य, साधू संत , हमें आत्मिक उन्नति का जो मार्ग बता रहे हैं। उस पर चिन्तन मनन कर अपने भीतर की यात्रा कर अपनी आत्मा का विकास कर सकें।
मधुर गायिका साध्वी डॉ श्रीसमीक्षा जी महाराज ठाणे 3 ने कहा कि हम इस संसार में आकर धन कमाने और उस धन से अपने जीवन को आराम दायक बनाने में लग जाते हैं। हम यह भूल जाते हैं कि यह मानव जन्म दुर्लभ है। इसलिए श्रावक को चाहिए कि वह संसारिक मोह-माया के चक्कर में न पड़कर जप तप धर्म ज्ञान को जीवन में आत्मसात कर अपनी आत्मा का विकास करें तभी हमारा यहजीवन सफल हो सकेगा अन्यथा हम इस संसार में चौरासी के चक्कर में ही फंसे रहेगे। जिया कब तक उलझेगा संसार विकल्पो में, कितने भव बीत चुके संकल्प विकल्पो में। उन्होंने कहा कि श्रावको के पास अभी भी समय है। श्रावक साधू संतो के सानिध्य में रहकर जप तप धर्म ज्ञान को जीवन में आत्मसात कर अपनी आत्मा का विकास करें ताकि वह अपना जीवन सुधार सकें। इस अवसर पर साध्वी श्री अर्हति जी महाराज ने भजन प्रस्तुत किया।
प्रवचन में श्री एस एस जैन सभा तिलक रोड के अध्यक्ष श्री अरुण कुमार जैन,उपाधयक्ष श्री डी, के जैन, महामंत्री श्री अनिल कुमार जैन, कोषाध्यक्ष श्री दिनेश कुमार जैन,उप मंत्री श्री कमल दीप जैन, पूर्व अध्यक्ष श्री महेन्द्र कुमार जैन, अनिल कुमार जैन, श्री आर के गुप्ता, अंकुर जैन व बडी संख्या में श्रावक श्राविकाएं उपस्थित रहे।


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